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APTT Test in Hindi: (एपीटीटी टेस्ट) प्रक्रिया, नॉर्मल रेंज, व्याख्या और रिपोर्ट का मतलब
Table of Contents
- एपीटीटी टेस्ट क्या है?
- खून का थक्का कैसे बनता है?
- एपीटीटी टेस्ट कब करवाने की सलाह दी जाती है?
- एपीटीटी टेस्ट कैसे किया जाता है?
- एपीटीटी टेस्ट की तैयारी कैसे करें?
- एपीटीटी टेस्ट के उपयोग क्या हैं?
- टेस्ट के दौरान क्या होता है?
- एपीटीटी टेस्ट के फायदे क्या हैं?
- क्या एपीटीटी टेस्ट में कोई जोखिम है?
- एपीटीटी टेस्ट कितना सटीक है?
- एपीटीटी टेस्ट के परिणाम
- निष्कर्ष
- FAQs
एपीटीटी टेस्ट क्या है?
एक्टिवेटेड पार्शियल थ्रोम्बोप्लास्टिन टाइम (एपीटीटी) टेस्ट यह मापता है कि खून का थक्का (blood clot) बनने में कितना समय लगता है। एपीटीटी ब्लड टेस्ट का उपयोग हीमोफीलिया (haemophilia) या वॉन विलेब्रांड रोग (von Willebrand's disease) जैसी स्थितियों वाले लोगों में खून के थक्के बनने की प्रक्रिया (क्लॉटिंग) को मॉनिटर करने के लिए किया जाता है। इसका उपयोग हेपरिन (heparin) या वारफरिन (warfarin) (कौमाडिन/Coumadin) जैसे ब्लड थिनर्स (blood thinners) के प्रभाव की निगरानी के लिए भी किया जा सकता है।
एपीटीटी को कई कारक प्रभावित कर सकते हैं, जैसे उम्र, लिंग, नस्ल, और दवाओं का उपयोग। अधिकांश मामलों में, एपीटीटी, पूर्ण रक्त गणना (सीबीसी/CBC) का एक हिस्सा होता है।
खून का थक्का कैसे बनता है?
क्लॉटिंग (थक्का बनने) की प्रक्रिया दो चरणों में होती है। पहले, प्लेटलेट्स आपकी रक्त वाहिकाओं (blood vessel) की दीवारों की अंदरूनी सतह से चिपक जाते हैं। फिर प्लेटलेट्स “क्लॉटिंग फैक्टर्स” (clotting factors) नाम के रसायन छोड़ते हैं, जिससे खून गाढ़ा होता है और एक दिखाई देने वाली पपड़ी (scab) बन जाती है।
एपीटीटी टेस्ट का उपयोग क्लॉटिंग प्रक्रिया में समस्या का पता लगाने के लिए किया जाता है। ये समस्याएँ निम्न कारणों से हो सकती हैं:
- खून की थक्का बनाने की क्षमता में समस्या, जैसे “कोएगुलेशन फैक्टर” (coagulation factor) कहलाने वाले कुछ खास प्रकार के प्रोटीन की कमी।
- खून में ताज़े या “प्रोटीओलाइटिक” थ्रोम्बिन (proteolytic thrombin) की कमी, जो एक प्रोटीन है और खून के थक्का बनने में मदद करता है।
- प्लेटलेट्स में ही कोई समस्या, जैसे उनका आकार असामान्य होना या उनका विकास/बनावट ठीक न होना।
एपीटीटी टेस्ट कब करवाने की सलाह दी जाती है?
एपीटीटी टेस्ट का उपयोग सबसे अधिक निम्न स्थितियों की स्क्रीनिंग और मॉनिटरिंग के लिए किया जाता है:
- बिना वजह चोट के निशान (bruising) पड़ना या खून बहना
- थ्रोम्बोएंबोलिज़्म (Thromboembolism) (खून के थक्के के कारण रक्त वाहिका में रुकावट)
- बार-बार गर्भपात (recurrent miscarriages)
- क्रॉनिक लिवर डिजीज़ (chronic liver diseases)
- अगर आपको ल्यूपस (lupus) के लक्षण हों
यह टेस्ट यह देखने के लिए भी किया जाता है कि कहीं आपको “ऑटोइम्यून डिजीज़” (autoimmune disease) नाम का कोई खास रक्त कोशिका (blood cell) विकार तो नहीं है। इन बीमारियों में रूमेटॉइड आर्थराइटिस (rheumatoid arthritis), ल्यूपस (lupus), और स्क्लेरोडर्मा (scleroderma) शामिल हैं।
एपीटीटी ब्लड टेस्ट का उपयोग सामान्यतः डी-डाइमर (D-dimer) को मॉनिटर करने के लिए भी किया जाता है। डी-डाइमर एक पदार्थ है जो शरीर में खून का थक्का बनने पर सामान्य रूप से रिलीज़ होता है। ट्रॉमा, सर्जरी, या किसी मेडिकल प्रक्रिया के बाद डी-डाइमर आपके खून में एक सप्ताह तक पाया जा सकता है।
यह उस घटना के बाद शरीर द्वारा खुद को ठीक करने (heal) की कोशिश का एक मार्कर (marker) होता है।
एपीटीटी टेस्ट कैसे किया जाता है?
यह टेस्ट डॉक्टर के क्लिनिक या किसी विशेष लैब में किया जाता है। आपकी बांह की नस (vein) से सुई के जरिए खून का एक छोटा नमूना लिया जाता है, जिसमें एक छोटा ट्यूब लगा होता है (इंट्रावीनस/आईवी लाइन (intravenous (IV) line))।
आपका डॉक्टर आपको हॉस्पिटल गाउन पहनने के लिए कह सकता है ताकि खून का नमूना लिया जा सके।
आपको पीठ के बल लेटने के लिए कहा जाएगा और आपके पैर ऊपर की तरफ (elevated) रखे जाएंगे। सुई लगाने वाली जगह पर डॉक्टर एक छोटा बैंडेज लगाएंगे। टेस्ट पूरा होने के बाद बैंडेज हटा दिया जाएगा।
ज्यादातर ब्लड टेस्ट स्वास्थ्य-सेटिंग में 2 hours के भीतर पूरे हो जाते हैं। लैब आपको परिणाम (results) बताने के लिए कॉल करेगी।
परिणाम आपके डॉक्टर को रिपोर्ट किए जाते हैं।
एपीटीटी टेस्ट की तैयारी कैसे करें?
एपीटीटी टेस्ट की तैयारी काफी सरल होती है। ध्यान रखने योग्य कुछ बातें:
- आप जो भी दवाएँ ले रहे हैं, खासकर ब्लड थिनर्स, उनके बारे में डॉक्टर को जरूर बताएं—क्योंकि ये एपीटीटी टेस्ट के परिणाम को प्रभावित कर सकती हैं।
- टेस्ट से पहले उपवास (fasting) की जरूरत नहीं होती, जब तक आपके हेल्थकेयर प्रोवाइडर ने खास तौर पर न कहा हो।
- पर्याप्त पानी पिएं (hydrated रहें) और डॉक्टर/लैब द्वारा दिए गए किसी भी विशेष निर्देश का पालन करें।
एपीटीटी टेस्ट के उपयोग क्या हैं?
एपीटीटी टेस्ट खून के थक्का बनने की क्षमता का आकलन करने के लिए एक महत्वपूर्ण जांच है। इसके मुख्य उपयोग:
- इंट्रिंसिक (intrinsic) और कॉमन (common) कोएगुलेशन पाथवे (coagulation pathways) का मूल्यांकन
- हेपरिन थेरेपी (heparin therapy)—जो एक सामान्य एंटीकोएगुलेंट (anticoagulant) दवा है—की निगरानी
- बिना वजह या अत्यधिक खून बहना, या थक्का बनने की घटनाओं की जांच
- हीमोफीलिया (hemophilia) या क्लॉटिंग फैक्टर की कमी जैसे ब्लीडिंग डिसऑर्डर का निदान
- लिवर फंक्शन का अप्रत्यक्ष आकलन, क्योंकि लिवर अधिकांश क्लॉटिंग फैक्टर्स बनाता है
- क्लॉटिंग फैक्टर इनहिबिटर्स (clotting factor inhibitors) की मौजूदगी की स्क्रीनिंग, जैसे ल्यूपस एंटीकोएगुलेंट (lupus anticoagulant)
एपीटीटी टेस्ट के उपयोग कई क्लिनिकल स्थितियों में भी होते हैं, जहाँ खून के क्लॉट बनने की क्षमता समझना निदान, उपचार और मॉनिटरिंग के लिए जरूरी होता है।
टेस्ट के दौरान क्या होता है?
एपीटीटी टेस्ट के दौरान हेल्थकेयर प्रोफेशनल:
- आमतौर पर आपकी बांह की नस से सुई द्वारा खून लेते हैं
- खून के नमूने को एक टेस्ट ट्यूब में इकट्ठा करते हैं, जिसमें एंटीकोएगुलेंट (anticoagulant) होता है
- नमूना जांच के लिए लैब में भेजते हैं
लैब में पूरा एपीटीटी टेस्ट प्रक्रिया आम तौर पर 30 to 60 minutes में पूरी हो जाती है।
एपीटीटी टेस्ट के फायदे क्या हैं?
एपीटीटी टेस्ट के कुछ प्रमुख फायदे:
- खून के थक्का बनने की क्षमता के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देता है, जिससे ब्लीडिंग डिसऑर्डर या अत्यधिक क्लॉटिंग का निदान करने में मदद मिलती है
- एंटीकोएगुलेंट थेरेपी को सुरक्षित तरीके से तय/एडजस्ट करने में मदद करता है, जिससे जटिलताओं (complications) से बचाव हो सकता है
- कम इनवेसिव (minimally invasive) और तेज—सिर्फ ब्लड सैंपल की जरूरत होती है
- क्लॉटिंग फैक्टर की कमी या इनहिबिटर्स की मौजूदगी का पता लगा सकता है
- कोएगुलेशन से जुड़ी स्थितियों में जल्दी हस्तक्षेप संभव बनाता है, जिससे डीप वेन थ्रॉम्बोसिस (deep vein thrombosis) या पल्मोनरी एंबोलिज़्म (pulmonary embolism) जैसी जानलेवा घटनाओं का जोखिम कम हो सकता है
एपीटीटी टेस्ट के फायदे इसे कई क्लिनिकल सेटिंग्स में एक जरूरी डायग्नोस्टिक जांच बनाते हैं, जिससे हेल्थकेयर प्रोवाइडर सही निर्णय लेकर लक्षित देखभाल दे पाते हैं।
क्या एपीटीटी टेस्ट में कोई जोखिम है?
एपीटीटी टेस्ट के जोखिम बहुत कम होते हैं और अधिकतर केवल ब्लड ड्रॉ प्रक्रिया से जुड़े होते हैं:
- सुई लगने वाली जगह पर हल्का दर्द या नीला पड़ना (bruising)
- सुई लगने वाली जगह पर संक्रमण (infection) का छोटा-सा जोखिम
- कभी-कभी चक्कर आना या बेहोशी जैसा महसूस होना (rarely)
एपीटीटी टेस्ट कितना सटीक है?
एपीटीटी टेस्ट को काफी सटीक माना जाता है। अलग-अलग टेस्ट के बीच परिणामों में बदलाव (variation) बहुत कम होता है। इसका मतलब यह है कि एक ही खून के नमूने पर किए गए दो टेस्ट के परिणाम आम तौर पर एक जैसे होंगे। एक्टिवेटेड पार्शियल थ्रोम्बोप्लास्टिन टाइम, ब्लड क्लॉट्स की मौजूदगी का अनुमान लगाने के लिए एक अपेक्षाकृत सटीक जांच है। हालांकि, यह 100% सटीक नहीं होती और कुछ अन्य कारक भी परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, हेपरिन (heparin) जैसी दवाएँ एपीटीटी को झूठा बढ़ा (falsely elevated) दिखा सकती हैं।
एपीटीटी टेस्ट के परिणाम
- नॉर्मल एपीटीटी परिणाम 35 seconds से कम या बराबर होता है।
एपीटीटी नॉर्मल रेंज व्यक्ति-व्यक्ति में अलग हो सकती है। स्वस्थ लोगों में एपीटीटी 35 seconds से कम हो सकता है।
- यदि एपीटीटी ब्लड टेस्ट का समय बढ़ा हुआ (prolonged) आता है, तो यह शरीर में सूजन (inflammation) के कम स्तर की मौजूदगी का संकेत दे सकता है।
अगर टेस्ट prolonged है, तो इसका मतलब यह भी हो सकता है कि आपको ल्यूपस (lupus) या स्जोग्रेन सिंड्रोम (Sjogren's syndrome) नाम की स्थिति हो सकती है।
सामान्य तौर पर, prolonged परिणाम स्वास्थ्य के लिए अच्छे नहीं माने जाते। - पीटी/एपीटीटी रेशियो (PT/APTT ratio) 1.0 से अधिक होने पर यह अंदरूनी हृदय रोग (underlying heart disease) और असामान्य कार्डियक फंक्शन (abnormal cardiac function) से जुड़ा हो सकता है; कम रेशियो को सामान्य सीमा (normal limits) के भीतर माना जाता है। कम पीटी/एपीटीटी रेशियो ऐसे मरीजों में पाया जा सकता है जो उम्र में छोटे हों और जिनकी रेस्टिंग पल्स रेट (resting pulse rate) ज्यादा हो।
निष्कर्ष
अगर आपको बिना वजह चोट के निशान पड़ते हैं या खून बहता है, थ्रोम्बोएंबोलिज़्म (thromboembolism) का जोखिम है, या क्रॉनिक लिवर डिजीज़ है, तो आपको एक्टिवेटेड पार्शियल थ्रोम्बोप्लास्टिन टाइम (एपीटीटी) टेस्ट करवाने की जरूरत पड़ सकती है। यह टेस्ट खून के थक्का बनने में लगने वाला समय मापता है और क्लॉटिंग प्रक्रिया में समस्या का पता लगाने में मदद करता है। यह टेस्ट जल्दी और आसानी से हो जाता है और अक्सर पूर्ण रक्त गणना (सीबीसी/CBC) टेस्ट का हिस्सा होता है। अगर आपको लगता है कि आपको क्लॉटिंग डिसऑर्डर हो सकता है या आप ब्लड थिनर्स ले रहे हैं, तो एपीटीटी टेस्ट के बारे में अपने डॉक्टर से बात करें। इससे यह सुनिश्चित होगा कि आपको जरूरी उपचार मिल रहा है।
FAQs
क्या एपीटीटी टेस्ट के लिए फास्टिंग जरूरी है?
नहीं, आम तौर पर एपीटीटी टेस्ट से पहले फास्टिंग की जरूरत नहीं होती।
अगर एपीटीटी टेस्ट हाई आए तो क्या होता है?
अगर एपीटीटी टेस्ट रिपोर्ट में परिणाम हाई आता है, तो इसका मतलब है कि खून को थक्का बनने में सामान्य से ज्यादा समय लग रहा है। यह कुछ क्लॉटिंग फैक्टर्स में कमी/गड़बड़ी, इनहिबिटर्स की मौजूदगी, या हेपरिन जैसी एंटीकोएगुलेंट थेरेपी (anticoagulant therapy) के प्रभाव का संकेत हो सकता है।
एपीटीटी टेस्ट prolonged होने का क्या मतलब है?
prolonged एपीटीटी टेस्ट यह संकेत देता है कि क्लॉटिंग फैक्टर्स की गतिविधि कम होने या एंटीकोएगुलेंट्स की मौजूदगी के कारण रक्तस्राव (bleeding) का जोखिम बढ़ सकता है। यह हीमोफीलिया (haemophilia), ल्यूपस एंटीकोएगुलेंट (lupus anticoagulant), लिवर डिजीज़, या विटामिन K की कमी (vitamin K deficiency) जैसी स्थितियों का संकेत हो सकता है।
क्या एपीटीटी टेस्ट सभी ब्लीडिंग डिसऑर्डर का निदान कर सकता है?
एपीटीटी टेस्ट कई क्लॉटिंग फैक्टर की कमी और कुछ ब्लीडिंग डिसऑर्डर का पता लगा सकता है, लेकिन यह सभी ब्लीडिंग कंडीशन्स को कवर नहीं करता।
एपीटीटी टेस्ट, पीटी टेस्ट से कैसे अलग है?
एपीटीटी टेस्ट इंट्रिंसिक और कॉमन क्लॉटिंग पाथवे मापता है, जबकि प्रोथ्रोम्बिन टाइम (पीटी/PT) टेस्ट एक्स्ट्रिंसिक और कॉमन पाथवे मापता है।
कौन-सी दवाएँ एपीटीटी टेस्ट के परिणाम को प्रभावित कर सकती हैं?
हेपरिन (heparin) और अन्य एंटीकोएगुलेंट्स एपीटीटी को बढ़ा सकते हैं। क्लॉटिंग या प्लेटलेट फंक्शन को प्रभावित करने वाली अन्य दवाएँ भी परिणामों को प्रभावित कर सकती हैं।
मुझे एपीटीटी टेस्ट कितनी बार करवाना चाहिए?
एपीटीटी टेस्टिंग की आवृत्ति आपकी मेडिकल स्थिति पर निर्भर करती है। उदाहरण के लिए, अगर आप हेपरिन थेरेपी पर हैं, तो आपको ज्यादा बार मॉनिटरिंग की जरूरत हो सकती है।
क्या डाइट एपीटीटी टेस्ट के परिणाम को प्रभावित कर सकती है?
आमतौर पर डाइट सीधे तौर पर एपीटीटी टेस्ट के परिणाम को प्रभावित नहीं करती। हालांकि, विटामिन K का अत्यधिक सेवन क्लॉटिंग फैक्टर्स को प्रभावित कर सकता है, जो एपीटीटी टेस्ट की तुलना में पीटी टेस्ट से ज्यादा संबंधित होते हैं।
क्या एपीटीटी टेस्ट दर्दनाक होता है?
एपीटीटी टेस्ट में सामान्य ब्लड ड्रॉ होता है, जिससे थोड़ी देर के लिए हल्की चुभन या असुविधा हो सकती है। हालांकि, अधिकांश लोगों को यह बहुत दर्दनाक नहीं लगता।
अगर मेरा एपीटीटी टेस्ट abnormal आए तो क्या होगा?
अगर आपका एपीटीटी टेस्ट परिणाम abnormal है, तो आपका हेल्थकेयर प्रोवाइडर इसे आपकी मेडिकल हिस्ट्री और अन्य टेस्ट्स के साथ मिलाकर समझेगा। कारण जानने के लिए अतिरिक्त जांच (additional testing) भी सुझाई जा सकती है।









